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Sunday, March 22, 2026

1975 का राष्ट्रीय आपात

 


1975 का राष्ट्रीय आपात

पृष्ठभूमि

1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 518 में से 352 सीटों पर विजय प्राप्त हुई।

श्रीमती इंदिरा गांधी की बढ़ती ताकत का फायदा इंदिरा के करीबी राजनेताओं उठाया। पूरे देश में भ्रष्टाचार और मंहगाई अपने चरम पर पहुंच गयी।

गुजरात आन्दोलन

बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के विरूद्ध 25 जनवरी 1974 को गुजरात में छात्रों ने नवनिर्माण आंदोलन के नाम से प्रदर्शन आरंभ कर दिया। फलस्वरूप पूरे गुजरात में कर्फ्यू लगा दिया गया।

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को त्यागपत्र देना पड़ा। इस आंदोलन में 100 से ज्यादा लोग मौत का शिकार हुए हजारों लोग घायल हुए तथा हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया।

बिहार आन्दोलन

गुजरात का मामला अभी शांत भी नही हुआ था कि इसी तरह का एक प्रदर्शन बिहार छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले बिहार में आरंभ हो गया। छात्र संघर्ष समिति बिहार में अब्दुल गफूर की सरकार को हटाने की मांग कर रही थी।

छात्रों ने पटना विश्वविद्यालय पर कब्जा कर लिया। 18 मार्च 1974 को छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। इसी समय छात्रों ने जय प्रकाश नारायण से आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की और जय प्रकाश नारायण इसके लिए राजी हो गये।

संपूर्ण क्रांति

5 जून 1974 को जय प्रकाश नारायण ने पटना की गांधी मैदान में ऐतिहासिक रैली को संबोधित किया और यहीं से उन्होने इंदिरा सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। जय प्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सबको एक जुट होने की अपील की।

उन्होने सरकारी कर्मचारियों से भी इस आंदोलन से जुड़ने का आग्रह किया। जे पी की संपूर्ण क्रांति ने कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन को हवा दी। धीरे-धीरे इस आंदोलन में सारे विपक्षी दल भी जुड़ते चले गये। सिर्फ कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया ही एकमात्र ऐसी पार्टी थी जो इस आंदोलन से नही जुडी।

इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण

1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली संसदीय क्षेत्र से 1 लाख से भी ज्यादा मतों से जीती थी। इनसे हारने वाले राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के उल्लंघन के आरोप में मामला दर्ज कर दिया। उनके अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गैर कानूनी साधनों का प्रयोग किया।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा की गई। उन्होने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री होते हुए भी अदालत में हाजिर होने के लिए समन जारी किया। 18 मार्च 1975 को भारतीय इतिहास में अब तक प्रथम बार किसी प्रधानमंत्री के रूप में श्रीमती इंदिरा गांधी अदालत के कटघरे में खड़ी हुई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय

12 जून 1975 इंदिरा के लिए सबसे बुरा दिन साबित हुआ। इसी दिन इंदिरा के सहयोगी डी पी धर का निधन हो गया। कांग्रेस गुजरात चुनाव हार गयी तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपना फैसला सुनाया। इस फैसले में उच्च न्यायालय में इंदिरा गांधी को 6 वर्ष के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दिया, साथ ही रायबरेली का चुनाव अवैध करार दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इलाहाबाद कोर्ट के फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहा न्यायमूर्ति बी आर कृष्ण अययर ने 24 जून 1975 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें उन्होने कहा कि अगली सुनवायी तक इंदिरा गांधी को सदन में मत करने का अधिकार नही होगा तथा सांसदों को मिलने वाले विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105) भी उनके छीन लिये जायेंगे, लेकिन वे प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती हैं। 

दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली

25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जय प्रकाश नारायण ने एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए फौज और पुलिस को सरकार का साथ न देने की अपील की। शासन ने इसी अपील को बगावत का आधार मानते हुए जय प्रकाश नारायण को गिरफ्तार करने का आदेश दिया गया।

इमरजेंसी की घोषणा

इन्ही विषम परिस्थितियों में संजय गांधी की पहल पर व सिर्द्धाथ शंकर रे की सलाह पर 25 जून 1975 को अर्धरात्रि में भारत के राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी तथा हजारों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस और मिडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इमरजेंसी का प्रभाव

हालांकि इमरजेंसी के दौरान कई सुधारात्मक उपाये भी किये गये। जैसे वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया गया, परिवार नियोजन को अपनाने हेतु सरकारों को सख्त किया गया, रेलें अपने समय पर चलने लगी, सरकारी कर्मचारी समय पर ऑफिस आने लगे इत्यादि।

परिवार नियोजन हेतु नसबन्दी कार्यक्रम चलाया गया लोगों को पकड़कर जबरदस्ती उनकी नसबन्दी की जाने लगी। इससे सरकार के तौर तरीकों का व्यापक विरोध हुआ जो बाद में हिंसात्मक हो गया। मुजफ्फरपुर में हुई पुलिस फायरिंग में 30 लोग मारे गये।

इसी प्रकार दिल्ली में अतिक्रमण विरोधी मुहिम के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट पर हजारों झुग्गी झोपड़ियों पर बुल्डोजर चलवा दिया गया। इस दौरान हुई पुलिस फायरिंग में 150 गरीब लोग मारे गये।

इमरजेंसी के दौरान संसद में विपक्ष के न होने का फायदा उठाकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने कई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन कर डाला। इससे संविधान की शक्ल ही बदल गई। ऐसे माहौल में अचानक 18 जनवरी 1977 को श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को खत्म करने एवं आम चुनाव करवाने की घोषणा कर दी गई। इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच हेतु शाह आयोग की नियुक्ति की गई।

38 वां संविधान संशोधन 1975- (21 जुलाई 1975)

38 वां तथा 39 वां संशोधन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले की प्रतिक्रिया के संदर्भ में लाया गया था जिसमें न्यायालय ने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लोकसभा में निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया था। इंदिरा जी को डर था कि कहीं इमरजेंसी के उनके निर्णय को न्यायालय द्वारा हटा न दिया जाय।

इसलिए 38 वे संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 352, 356 व 360 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की गयी आपात की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया। यह भी कहा गया कि आपात की एक से अधिक उद्घोषणायें एक साथ चल सकती हैं तथा आपात आशंका के आधार पर भी लगाया जा सकता है।

इंदिरा जी संसद को किनारे कर की गयी राष्ट्रपति की विधि निर्माण की शक्तियों को हथियार बनाना चाहती थी। इसलिए इस संशोधन अधिनियम से अनुच्छेद 123 व 213 में संशोधन कर कहा गया कि राष्ट्रपति व राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 

39 वां संविधान संशोधन 1975 (10 अगस्त 1975)

अब इंदिरा जी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का डर था। पहले तो उन्होंने एक निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में परिवर्तन कर दिया कि चुनाव में किसी प्रतिनिधि द्वारा गलत साधन का उपयोग करने पर दोषी व्यक्ति राष्ट्रपति के सम्मुख याचिका कर सकता है और राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा।

39 वां संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और लोकसभा अध्यक्ष से संबंधित विवादों को न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर किया गया। यह तय किया गया कि इनसे संबंधित विवादों का निर्धारण संसद द्वारा सुनिश्चित किये गए प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा। (अनुच्छेद 329)

इस संशोधन द्वारा निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम 1975, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 व मीसा को 9 वीं अनुसूची में शामिल कर दिया।

7 नवम्बर 1975 को सर्वोच्च न्यायालय में इंदिरा गाधी के चुनाव सम्बन्धी मामले की अगली सुनवायी हुई और परिवर्तित परिस्थितियों में न्यायालय का इस मामले में सुनवाई का अधिकार समाप्त हो गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का मामला खारिज कर दिया। इंदिरा जी साफ साफ बच गयी।

 

1975 आपातकाल – TIMELINE

🔹 1971

  • इंदिरा गांधी की भारी जीत (352 सीटें)

🔹 25 जनवरी 1974

  • गुजरात नवनिर्माण आंदोलन शुरू

🔹 5 जून 1974

  • Jayaprakash Narayan संपूर्ण क्रांति”

🔹 12 जून 1975

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द

🔹 24 जून 1975

  • सुप्रीम कोर्ट सीमित राहत

🔹 25 जून 1975 (रात)

  • रामलीला मैदान रैली
  • आपातकाल घोषित

🔹 1975 (जुलाई–अगस्त)

  • 38वाँ व 39वाँ संविधान संशोधन

🔹 1975–76

  • प्रेस सेंसरशिप
  • नसबंदी अभियान
  • तुर्कमान गेट घटना

🔹 18 जनवरी 1977

  • चुनाव की घोषणा

🔹 21 मार्च 1977

  • आपात समाप्त

Sunday, December 21, 2025

मध्य प्रदेश में उद्योग और आर्थिक विकास उत्प्रेरक (Industry and economic development catalysts in Madhya Pradesh)

 

मध्य प्रदेश में उद्योग और आर्थिक विकास उत्प्रेरक (Industry and economic development catalysts in Madhya Pradesh)

   मध्य प्रदेश में उद्योगों की उत्पादकता और औद्योगिकीकरण में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई है। यह वृद्धि राज्य में किए गए बड़े निवेशों, उद्योगों की बढ़ी हुई क्षमताओं और सरकारी नीतियों के कारण संभव हो पाई है।

1.    निवेशों और उत्पादकता में वृद्धि

   पिछले पंद्रह वर्षों में स्थायी पूंजी निवेश की वार्षिक औसत वृद्धि दर 21.6 प्रतिशत रही है, जबकि शुद्ध मूल्य वर्धन की वार्षिक औसत वृद्धि दर 12.2 प्रतिशत रही है। इससे राज्य के उद्योगों की उत्पादकता और विकास में सुधार हुआ है।

2.    औद्योगिकीकरण में वृद्धि

   उद्योगों की बढ़ी हुई क्षमताओं के परिणामस्वरूप, वित्त वर्ष 2020-21 और वित्त वर्ष 2021-22 में शुद्ध मूल्य वर्धन 27.3 प्रतिशत की उच्चतम औसत वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ा, जो राज्य के तेजी से औद्योगिकीकरण का संकेत है।

3.    एमएसएमई का विस्तार

   राज्य में 4.57 लाख पंजीकृत एमएसएमई इकाइयां हैं, जिनमें 97.7 प्रतिशत सूक्ष्म, 2.12 प्रतिशत लघु, और 0.15 प्रतिशत मध्यम इकाइयां हैं। 2018-2023 के बीच, कंपनी अधिनियम 2013 के तहत राज्य में कंपनियों का पंजीकरण 11.1 प्रतिशत की वार्षिक औसत वृद्धि दर से बढ़ा, जो राष्ट्रीय औसत 8.8 प्रतिशत से अधिक है।

4.    स्टार्टअप्स में वृद्धि

   मध्य प्रदेश ने अपनी स्टार्टअप नीति 2022 के क्रियान्वयन के बाद से कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि की है। स्टार्टअप नीति 2022 के तहत, 2023 तक राज्य में स्टार्टअप्स में 126 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स में भी 140 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो महिलाओं के नेतृत्व में व्यवसायों को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों का परिणाम है।

5.    निर्यात में वृद्धि

   भारत के कुल व्यापारिक निर्यात में मध्य प्रदेश का योगदान वित्त वर्ष 2023-24 में 1.8 प्रतिशत रहा। राज्य से निर्यात की प्रमुख वस्तु फार्मास्युटिकल उत्पाद है, जिसका मूल्य 13,158 करोड़ रुपये है।

6.    निर्यात संवर्धन की पहलें

   मध्य प्रदेश व्यापार संवर्धन परिषद (एमपीटीपीसी) और निर्यात प्रकोष्ठ ने 40 से अधिक कार्यक्रमों और पहलों में भाग लिया। निर्यात हब पहल के तहत, जिला-केंद्रित निर्यात वृद्धि को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे आत्मनिर्भरता और आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित की जा रही है।

7.    निर्यात में इंदौर का योगदान

   वित्त वर्ष 2023-24 में इंदौर 20,256 करोड़ रुपये के निर्यात के साथ सबसे अधिक निर्यात करने वाला जिला बन गया है। इस पहल का उद्देश्य एमएसएमई, किसानों, और छोटे उद्यमों को विदेशी बाजारों में निर्यात के अवसरों से सशक्त बनाना है।

8.    निर्यात तैयारी सूचकांक

   मध्य प्रदेश के निर्यात तैयारी सूचकांक में पिछले वर्ष की तुलना में सुधार हुआ है। राज्य का कुल स्कोर 55.68 रहा और 2022 में यह समग्र रूप से 12वें स्थान पर और भूमि से घिरे राज्यों में 5वें स्थान पर था।

9.    लॉजिस्टिक्स रिपोर्ट में स्थिति

   लॉजिस्टिक्स ईज एक्रॉस डिफरेंट स्टेट्स (LEADS) 2022 रिपोर्ट में मध्य प्रदेश ने फास्ट मूवर श्रेणी में स्थान प्राप्त किया है, जो राज्य की लॉजिस्टिक्स दक्षता को दर्शाता है।

10.  नवकरणीय ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि

   2012 में 438.01 मेगावाट की स्थापित क्षमता को दिसंबर 2023 में बढ़ाकर 5,462.09 मेगावाट कर दिया गया है, जो 1,147.02 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। राज्य का योगदान देश के कुल सौर उत्पादन में 8.2 प्रतिशत है, जो इसे चौथे स्थान पर रखता है।

   रीवा मेगा सौर परियोजना के माध्यम से 750 मेगावाट का उत्पादन किया जाता है, जिसमें से एक भाग दिल्ली मेट्रो को भी दिया जाता है।

11.  जल संरक्षण और भूजल सुधार

   बुंदेलखंड क्षेत्र के 6 जिलों के 9 विकासखंडों में जल संरक्षण और भूजल सुधार के लिए अटल भूजल योजना लागू की गई है। राज्य का 2027 तक 53 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य सिंचित क्षेत्र विकसित करने का लक्ष्य है।

   महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना पर काम चल रहा है, जिससे 103 मेगावाट जल विद्युत उत्पन्न होगी और लगभग 41 लाख आबादी को पेयजल उपलब्ध कराने के अलावा बुंदेलखंड (4.51 लाख हेक्टेयर) और बेतवा बेसिन (2.06 लाख हेक्टेयर) में सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

Saturday, December 20, 2025

गैर-निष्पादित आस्तियां (Non-Performing Assets - NPA)

 


गैर-निष्पादित आस्तियां (Non-Performing Assets - NPA)

   गैर-निष्पादित आस्तियां वह ऋण या एडवांस होते हैं जो बैंक या वित्तीय संस्थान को समय पर चुकता नहीं किए जाते। सरल शब्दों में, जब कोई बैंक से ऋण लेता है और उसे समय पर ब्याज या मूलधन के रूप में वापस नहीं करता, तो वह ऋण बैंक के लिए गैर-निष्पादित आस्ति बन जाता है।

   गैर-निष्पादित आस्तियों की विशेषताएँ (Characteristics of non-performing assets)

1.    किसी भी ऋण को एनपीए तभी माना जाता है जब उधारकर्ता 90 दिनों तक ब्याज या मूलधन की किश्त का भुगतान नहीं करता।

2.    एनपीए से बैंकों की आय प्रभावित होती है, क्योंकि बैंक उस पर ब्याज नहीं कमा सकते हैं और इससे उनकी पूंजी और लाभप्रदता में कमी आती है।

3.    अधिक एनपीए बैंकों की बैलेंस शीट को कमजोर करता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर असर पड़ता है।

   एनपीए का प्रभाव

1.    एनपीए के बढ़ने से बैंकों की आय पर असर पड़ता है क्योंकि वे इस पर ब्याज नहीं कमा पाते हैं।

2.    अधिक एनपीए से बैंकों की उधार क्षमता घटती है, जिससे आर्थिक विकास में कमी आ सकती है।

3.    बैंक जिनकी एनपीए दर अधिक होती है, उन पर निवेशकों का विश्वास कम हो जाता है।

   एनपीए को नियंत्रित करने के उपाय

1.    बैंकों को ऋण देने की प्रक्रिया में सख्ती बरतनी चाहिए ताकि केवल पात्र ग्राहकों को ही ऋण दिया जा सके।

2.    बैंकों को उन तरीकों पर ध्यान देना चाहिए जो उधारकर्ताओं से धन की वसूली में मदद कर सकते हैं, जैसे कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (प्ठब्)।

3.    एनपीए की समस्या को समय पर पहचानकर उसका हल निकाला जा सकता है, जैसे नियमित पुनर्गठन और निरीक्षण।

   सरफरेसी अधिनियम 2002- (SARFAESI Act 2002 2002)

(The Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002)

   सरफेसी अधिनियम बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को ऋण वसूली के लिए वाणिज्यिक या आवासीय संपत्तियों की नीलामी करने की अनुमति देता है, जब कोई उधारकर्ता ऋण राशि चुकाने में विफल रहता है।

   इसके अलावा,सरफेसी अधिनियम, 2002 बैंकों को वसूली विधियों और पुनर्निर्माण के माध्यम से अपनी गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) को कम करने में सक्षम बनाता है।

   सरफेसी अधिनियम में प्रावधान है कि बैंक कृषि भूमि को छोड़कर किसी उधारकर्ता की संपत्ति को अदालत में जाए बिना जब्त कर सकते हैं। असुरक्षित संपत्तियों के मामले में, बैंक को अदालत में जाना होगा और डिफॉल्टरों के खिलाफ सिविल मामला दायर करना होगा।

   गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की श्रेणियाँ

   90 दिनों से अधिक समय तक गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की अवधि के आधार पर, उन्हें विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

   घटिया परिसंपत्ति- एक गैर-निष्पादित परिसंपत्ति जो 12 महीने से कम या उसके बराबर समय से बकाया है, वह घटिया परिसंपत्ति है।

   संदिग्ध परिसंपत्ति- यह एक ऐसी परिसंपत्ति है जो 12 महीने से अधिक समय तक एनपीए बनी हुई है।

   घाटे वाली परिसंपत्ति- एक परिसंपत्ति जो 3 साल से अधिक समय तक गैर-निष्पादित परिसंपत्ति बनी रहती है, वह घाटे वाली परिसंपत्ति होती है। ऐसा तब होता है जब बैंक को कुल नुकसान का सामना करना पड़ता है क्योंकि वह परिसंपत्ति की वसूली नहीं कर पाता है।

   राज्य में एनपीए की स्थिति

   प्रदेश में निजी बैंकों, लघु वित्त बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की गैर-निष्पादित आस्तियों में क्रमशः 47 प्रतिशत, 19 प्रतिशत, और 6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

   यह बैंकिंग क्षेत्र की संपत्ति गुणवत्ता में सुधार को दर्शाता है, जो कि वित्तीय स्थिरता के लिए सकारात्मक संकेत है।

   सरकार द्वारा बैंकिंग सेवाओं के विस्तार और ऋण की पहुंच को बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों से मध्य प्रदेश में आर्थिक विकास और वित्तीय स्थिरता को बल मिल रहा है। एन पी ए में आई कमी से बैंकिंग क्षेत्र की सुदृढ़ता और सुधार के संकेत मिलते हैं, जिससे भविष्य में राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायता मिलेगी।

 

 

 

प्रधानमंत्री जन-धन योजना (Prime Minister's Jan Dhan Yojana)

 


प्रधानमंत्री जन-धन योजना (Prime Minister's Jan Dhan Yojana)

   प्रधानमंत्री जन-धन योजना भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण वित्तीय समावेशन योजना है, जिसे 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य देश के सभी लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़कर उन्हें बैंक खाते की सुविधा प्रदान करना और वित्तीय सेवाओं तक उनकी पहुंच बढ़ाना है।

   प्रधानमंत्री जन-धन योजना के मुख्य उद्देश्य

1. गरीब और ग्रामीण आबादी के बीच बैंकिंग सेवाओं का विस्तार करना।

2.  प्रत्येक परिवार के पास बैंक खाता हो, जिससे वे सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से अपनी आर्थिक गतिविधियाँ कर सकें।

3.  सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे उनके जन-धन खातों में पहुंचाना, जिससे भ्रष्टाचार में कमी हो और पारदर्शिता बढ़े।

4.  आम लोगों में बचत की आदत को प्रोत्साहित करना और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना।

   योजना की विशेषताएँ

1.  जन-धन योजना के तहत बैंक खाते में न्यूनतम शेष की आवश्यकता नहीं होती है।

2.  सभी खाताधारकों को रुपे डेबिट कार्ड प्रदान किया जाता है, जिससे वे एटीएम से पैसे निकाल सकते हैं और खरीदारी कर सकते हैं।

3.  इस योजना के तहत खाताधारक को 2 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा कवर मिलता है।

4.  इस योजना में खाताधारकों को 10,000 रुपये तक की ओवरड्राफ्ट सुविधा भी दी जाती है। यह सुविधा खाताधारक के खाते में न्यूनतम 6 महीने तक सक्रियता के बाद उपलब्ध होती है।

5.  खाताधारकों को मोबाइल बैंकिंग के जरिए खाते की जानकारी प्राप्त करने और लेन-देन करने की सुविधा मिलती है।

6.  खाताधारकों को बीमा और पेंशन सेवाओं से जोड़ा गया है, जिससे उन्हें सामाजिक सुरक्षा भी मिले।

   प्रधानमंत्री जन-धन योजना भारत में एक बड़ी सफलता साबित हुई है। मार्च 2023 तक, इस योजना के तहत 47 करोड़ से अधिक जन-धन खाते खोले गए, जिनमें महिलाओं, ग्रामीण और वंचित वर्गों का बड़ा हिस्सा शामिल है। इस योजना ने भारत में वित्तीय समावेशन को नया आयाम दिया है और गरीब वर्ग को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

   मध्य प्रदेश में इस योजना के तहत 4.29 करोड़ से अधिक लोगों को बैंकिंग सुविधाओं से जोड़ा गया है, जिससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला है।