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Sunday, March 22, 2026

1975 का राष्ट्रीय आपात

 


1975 का राष्ट्रीय आपात

पृष्ठभूमि

1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 518 में से 352 सीटों पर विजय प्राप्त हुई।

श्रीमती इंदिरा गांधी की बढ़ती ताकत का फायदा इंदिरा के करीबी राजनेताओं उठाया। पूरे देश में भ्रष्टाचार और मंहगाई अपने चरम पर पहुंच गयी।

गुजरात आन्दोलन

बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के विरूद्ध 25 जनवरी 1974 को गुजरात में छात्रों ने नवनिर्माण आंदोलन के नाम से प्रदर्शन आरंभ कर दिया। फलस्वरूप पूरे गुजरात में कर्फ्यू लगा दिया गया।

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को त्यागपत्र देना पड़ा। इस आंदोलन में 100 से ज्यादा लोग मौत का शिकार हुए हजारों लोग घायल हुए तथा हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया।

बिहार आन्दोलन

गुजरात का मामला अभी शांत भी नही हुआ था कि इसी तरह का एक प्रदर्शन बिहार छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले बिहार में आरंभ हो गया। छात्र संघर्ष समिति बिहार में अब्दुल गफूर की सरकार को हटाने की मांग कर रही थी।

छात्रों ने पटना विश्वविद्यालय पर कब्जा कर लिया। 18 मार्च 1974 को छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। इसी समय छात्रों ने जय प्रकाश नारायण से आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की और जय प्रकाश नारायण इसके लिए राजी हो गये।

संपूर्ण क्रांति

5 जून 1974 को जय प्रकाश नारायण ने पटना की गांधी मैदान में ऐतिहासिक रैली को संबोधित किया और यहीं से उन्होने इंदिरा सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। जय प्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सबको एक जुट होने की अपील की।

उन्होने सरकारी कर्मचारियों से भी इस आंदोलन से जुड़ने का आग्रह किया। जे पी की संपूर्ण क्रांति ने कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन को हवा दी। धीरे-धीरे इस आंदोलन में सारे विपक्षी दल भी जुड़ते चले गये। सिर्फ कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया ही एकमात्र ऐसी पार्टी थी जो इस आंदोलन से नही जुडी।

इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण

1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली संसदीय क्षेत्र से 1 लाख से भी ज्यादा मतों से जीती थी। इनसे हारने वाले राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के उल्लंघन के आरोप में मामला दर्ज कर दिया। उनके अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गैर कानूनी साधनों का प्रयोग किया।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा की गई। उन्होने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री होते हुए भी अदालत में हाजिर होने के लिए समन जारी किया। 18 मार्च 1975 को भारतीय इतिहास में अब तक प्रथम बार किसी प्रधानमंत्री के रूप में श्रीमती इंदिरा गांधी अदालत के कटघरे में खड़ी हुई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय

12 जून 1975 इंदिरा के लिए सबसे बुरा दिन साबित हुआ। इसी दिन इंदिरा के सहयोगी डी पी धर का निधन हो गया। कांग्रेस गुजरात चुनाव हार गयी तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपना फैसला सुनाया। इस फैसले में उच्च न्यायालय में इंदिरा गांधी को 6 वर्ष के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दिया, साथ ही रायबरेली का चुनाव अवैध करार दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इलाहाबाद कोर्ट के फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहा न्यायमूर्ति बी आर कृष्ण अययर ने 24 जून 1975 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें उन्होने कहा कि अगली सुनवायी तक इंदिरा गांधी को सदन में मत करने का अधिकार नही होगा तथा सांसदों को मिलने वाले विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105) भी उनके छीन लिये जायेंगे, लेकिन वे प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती हैं। 

दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली

25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जय प्रकाश नारायण ने एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए फौज और पुलिस को सरकार का साथ न देने की अपील की। शासन ने इसी अपील को बगावत का आधार मानते हुए जय प्रकाश नारायण को गिरफ्तार करने का आदेश दिया गया।

इमरजेंसी की घोषणा

इन्ही विषम परिस्थितियों में संजय गांधी की पहल पर व सिर्द्धाथ शंकर रे की सलाह पर 25 जून 1975 को अर्धरात्रि में भारत के राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी तथा हजारों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस और मिडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इमरजेंसी का प्रभाव

हालांकि इमरजेंसी के दौरान कई सुधारात्मक उपाये भी किये गये। जैसे वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया गया, परिवार नियोजन को अपनाने हेतु सरकारों को सख्त किया गया, रेलें अपने समय पर चलने लगी, सरकारी कर्मचारी समय पर ऑफिस आने लगे इत्यादि।

परिवार नियोजन हेतु नसबन्दी कार्यक्रम चलाया गया लोगों को पकड़कर जबरदस्ती उनकी नसबन्दी की जाने लगी। इससे सरकार के तौर तरीकों का व्यापक विरोध हुआ जो बाद में हिंसात्मक हो गया। मुजफ्फरपुर में हुई पुलिस फायरिंग में 30 लोग मारे गये।

इसी प्रकार दिल्ली में अतिक्रमण विरोधी मुहिम के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट पर हजारों झुग्गी झोपड़ियों पर बुल्डोजर चलवा दिया गया। इस दौरान हुई पुलिस फायरिंग में 150 गरीब लोग मारे गये।

इमरजेंसी के दौरान संसद में विपक्ष के न होने का फायदा उठाकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने कई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन कर डाला। इससे संविधान की शक्ल ही बदल गई। ऐसे माहौल में अचानक 18 जनवरी 1977 को श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को खत्म करने एवं आम चुनाव करवाने की घोषणा कर दी गई। इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच हेतु शाह आयोग की नियुक्ति की गई।

38 वां संविधान संशोधन 1975- (21 जुलाई 1975)

38 वां तथा 39 वां संशोधन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले की प्रतिक्रिया के संदर्भ में लाया गया था जिसमें न्यायालय ने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लोकसभा में निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया था। इंदिरा जी को डर था कि कहीं इमरजेंसी के उनके निर्णय को न्यायालय द्वारा हटा न दिया जाय।

इसलिए 38 वे संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 352, 356 व 360 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की गयी आपात की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया। यह भी कहा गया कि आपात की एक से अधिक उद्घोषणायें एक साथ चल सकती हैं तथा आपात आशंका के आधार पर भी लगाया जा सकता है।

इंदिरा जी संसद को किनारे कर की गयी राष्ट्रपति की विधि निर्माण की शक्तियों को हथियार बनाना चाहती थी। इसलिए इस संशोधन अधिनियम से अनुच्छेद 123 व 213 में संशोधन कर कहा गया कि राष्ट्रपति व राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 

39 वां संविधान संशोधन 1975 (10 अगस्त 1975)

अब इंदिरा जी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का डर था। पहले तो उन्होंने एक निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में परिवर्तन कर दिया कि चुनाव में किसी प्रतिनिधि द्वारा गलत साधन का उपयोग करने पर दोषी व्यक्ति राष्ट्रपति के सम्मुख याचिका कर सकता है और राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा।

39 वां संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और लोकसभा अध्यक्ष से संबंधित विवादों को न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर किया गया। यह तय किया गया कि इनसे संबंधित विवादों का निर्धारण संसद द्वारा सुनिश्चित किये गए प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा। (अनुच्छेद 329)

इस संशोधन द्वारा निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम 1975, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 व मीसा को 9 वीं अनुसूची में शामिल कर दिया।

7 नवम्बर 1975 को सर्वोच्च न्यायालय में इंदिरा गाधी के चुनाव सम्बन्धी मामले की अगली सुनवायी हुई और परिवर्तित परिस्थितियों में न्यायालय का इस मामले में सुनवाई का अधिकार समाप्त हो गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का मामला खारिज कर दिया। इंदिरा जी साफ साफ बच गयी।

 

1975 आपातकाल – TIMELINE

🔹 1971

  • इंदिरा गांधी की भारी जीत (352 सीटें)

🔹 25 जनवरी 1974

  • गुजरात नवनिर्माण आंदोलन शुरू

🔹 5 जून 1974

  • Jayaprakash Narayan संपूर्ण क्रांति”

🔹 12 जून 1975

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द

🔹 24 जून 1975

  • सुप्रीम कोर्ट सीमित राहत

🔹 25 जून 1975 (रात)

  • रामलीला मैदान रैली
  • आपातकाल घोषित

🔹 1975 (जुलाई–अगस्त)

  • 38वाँ व 39वाँ संविधान संशोधन

🔹 1975–76

  • प्रेस सेंसरशिप
  • नसबंदी अभियान
  • तुर्कमान गेट घटना

🔹 18 जनवरी 1977

  • चुनाव की घोषणा

🔹 21 मार्च 1977

  • आपात समाप्त

Sunday, November 9, 2025

पांचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम 1996 | Fifth Schedule & PESA Act 1996

 


पांचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम 1996 | Fifth Schedule & PESA Act 1996

🔹 पांचवीं अनुसूची का परिचय

भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची उन प्रावधानों से संबंधित है जो अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए बनाए गए हैं।

🔹 अनुच्छेद 244(1)

  • पांचवीं अनुसूची के प्रावधान असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में लागू होते हैं।

  • इन चारों राज्यों के लिए छठी अनुसूची लागू होती है।

🔹 पांचवीं अनुसूची से संबंधित प्रमुख राज्य

वर्तमान में 10 राज्यों में पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र चिन्हित हैं —
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश।

🔹 मध्य प्रदेश में पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत जिले

झाबुआ, अलीराजपुर, धार, खरगोन, खंडवा, बैतूल, सिवनी, मंडला, बालाघाट, मुरैना और रतलाम (सैलाना तहसील)।

🔹 अनुसूचित क्षेत्रों की घोषणा

  • किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है।

  • राष्ट्रपति, संबंधित राज्यपाल से परामर्श के बाद क्षेत्रफल बढ़ा या घटा सकता है।

🔹 राज्य व केंद्र की कार्यकारी शक्तियाँ

  • राज्य की कार्यकारी शक्ति अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तारित है।

  • केंद्र सरकार राज्य को इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में निर्देश दे सकती है।

  • राज्यपाल को प्रत्येक वर्ष अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजनी होती है।

🔹 जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC)

  • प्रत्येक अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्य में एक जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन किया जाता है।

  • परिषद में 20 सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन-चौथाई (15 सदस्य) राज्य विधानसभा के अनुसूचित जनजाति वर्ग से होने चाहिए।

  • इसका उद्देश्य जनजातीय कल्याण से संबंधित नीतियों पर राज्यपाल को सलाह देना है।

🔹 राज्यपाल की शक्तियाँ

राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं –

  • शांति एवं सुशासन के लिए नियम बनाना।

  • भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाना।

  • अनुसूचित जनजातियों के लिए भूमि आवंटन के नियम बनाना।

  • साहूकारी व्यवसाय को नियंत्रित करना।

  • किसी राज्य या संसद के कानून को अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू न करने या संशोधित रूप में लागू करने का अधिकार।

🟢 पेसा अधिनियम 1996 (Panchayat Extension to Scheduled Areas Act, 1996)

🔹 पृष्ठभूमि

  • संविधान के 73वें संशोधन (1992) द्वारा पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई (24 अप्रैल 1994)।

  • लेकिन अनुच्छेद 243(एम) के अनुसार, पंचायती राज व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं थी।

  • भूरिया समिति (1995) की सिफारिशों पर पेसा अधिनियम, 1996 अस्तित्व में आया।

🔹 मुख्य उद्देश्य

  1. अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय स्वशासन को मान्यता देना।

  2. ग्राम सभाओं को भूमि, जल, वन और खनिज संसाधनों पर अधिकार प्रदान करना।

  3. जनजातीय परंपरा और संस्कृति के संरक्षण हेतु स्वायत्त शासन प्रणाली सुनिश्चित करना।

🔹 मध्य प्रदेश में पेसा नियम 2022

  • 15 नवम्बर 2022 (जनजातीय गौरव दिवस) पर मध्य प्रदेश ने अपने पेसा नियमों को अधिसूचित किया।

  • शहडोल में आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन में राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पेसा नियमावली की प्रति भेंट की।

  • इसका उद्देश्य जनजातीय समाज को ग्राम स्तर पर अधिकार संपन्न बनाना है।

🔹 पेसा अधिनियम की मूल भावना

ग्राम सभा सर्वोपरि है” —
ग्राम सभा ही स्थानीय संसाधनों, सामाजिक न्याय, और पारंपरिक निर्णय प्रणाली की सर्वोच्च इकाई मानी गई है।

🔹 सारांश

पांचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम भारत के जनजातीय समाज के लिए संवैधानिक सुरक्षा कवच हैं।
इनका उद्देश्य जनजातियों की भूमि, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की रक्षा करते हुए उन्हें शासन में भागीदार बनाना है।

जनजातियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान | Constitutional Provisions Related to Tribes

 


जनजातियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान | Constitutional Provisions Related to Tribes

🔹 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1931 की जनगणना से पहले जनजातियों को “वनवासी”, “आदिवासी” या “गिरीजन” कहा जाता था।

  • 1931 की जनगणना के कमिश्नर जे.एच. हट्टन ने इन्हें पहली बार “आदिम जाति” के रूप में वर्गीकृत किया।

  • बेरियर एल्विन ने इन्हें “भारत का मूल स्वामी” बताया और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण हेतु “राष्ट्रीय उपवन” की अवधारणा दी।

  • जी.एस. घुर्ये ने अपनी पुस्तक Caste and Race in India में इन्हें “पिछड़े हिन्दू” कहा।

  • ठक्कर बापा ने अपनी पुस्तक Tribes of India (1950) में इन्हें “गिरीजन” कहा।

  • ब्रिटिश शासन में इन्हें “एनिमिस्ट” कहा जाता था, पर 1931 में “जनजाति” शब्द का प्रयोग किया गया।


🔹 संविधानिक परिभाषा

  • अनुच्छेद 366(25) – “अनुसूचित जनजाति” का अर्थ उन जनजातियों या जनजातीय समुदायों से है जिन्हें अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया गया हो।

  • अनुच्छेद 342 – राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श कर किसी जनजाति को अनुसूचित घोषित कर सकता है।


🔹 जनजातीय कल्याण हेतु प्रमुख संवैधानिक उपबंध

अनुच्छेदप्रावधानउद्देश्य
15(4), 15(5)शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान हेतु विशेष प्रावधान एवं आरक्षणशिक्षा में समान अवसर
16(4), 16(4A)रोजगार एवं पदोन्नति में आरक्षणप्रशासनिक प्रतिनिधित्व
23-24जबरन श्रम, बाल श्रम पर प्रतिबंधशोषण से सुरक्षा
29भाषा, लिपि एवं संस्कृति की रक्षासांस्कृतिक संरक्षण
46अनुसूचित जाति-जनजाति के शैक्षिक-आर्थिक हितों का संवर्धनसामाजिक न्याय
164उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में “आदिवासी कल्याण मंत्री”नीति-निर्माण में भागीदारी
243Dपंचायतों में आरक्षणस्थानीय स्वशासन में सहभागिता
330-332लोकसभा व विधानसभा में आरक्षणराजनीतिक प्रतिनिधित्व
334आरक्षण अवधि का विस्तार (2030 तक)निरंतर संरक्षण
275केंद्र द्वारा राज्यों को विशेष अनुदानजनजातीय क्षेत्र का विकास

🔹 विशेष अधिनियम व नीतियाँ

  • बंधुआ श्रम उन्मूलन अधिनियम, 1976

  • अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार अधिनियम), 2006

  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम – PESA, 1996

Saturday, October 25, 2025

संविधान के भाग और उनकी साज सज्जा (illumination) प्रस्तावना यानी (Back cover) सहित संविधान के प्रत्येक पृष्ठ की साज सज्जा - बेहर राममनोहर सिन्हा तथा नंदलाल बोस (शांति निकेतन कलाकार)

 













































यह पोस्ट Rudra’s IAS द्वारा तैयार की गई है।

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Friday, October 24, 2025

समाजवाद (Socialization) A टू Z | समाजवाद क्या है | समाजवाद के बारे में वह सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं

 


समाजवाद का अर्थ

समाजवाद से तात्पर्य एक ऐसी विचारधारा से है जो एक स्वस्थ समाज के निर्माण को प्राथमिकता देती है।

स्वस्थ समाज से तात्पर्य एक ऐसे समाज से है जिसमें बड़े पैमाने पर सामाजिक - आर्थिक पर असमानता विधमान न हो तथा लोगों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान जीवन अवसर प्राप्त हों। प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान युक्त जीवन जीने का अधिकार हो. तात्पर्य यह है कि समाज में कोई मूलभूत अधिकारों एवं सुविधाओं से वंचित न हो.

समाजवाद और साम्यवाद में भेद

समाजवाद समाज में व्याप्त असमानताओं को समाप्त करने का पक्षधर होता है। इसीलिए कई बार इसे साम्यवाद भी कहा जाता है। हलांकि साम्यवाद की तुलना में समाजवाद काफी व्यापक अवधारणा है। साम्यवाद केवल सामाजिक आर्थिक असमानता को कायम करने का पक्षधर होता है, जबकि समाजवाद समानता के साथ साथ सामाजिक न्याय, समाज कल्याण तथा समाज को शक्तिशाली बनाने का पक्षधर होता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि



ऐतिहासिक आधार पर ग्रीक विद्वान प्लैटो को समाजवाद का जनक माना जाता है। हालांकि प्लैटो समाजवाद का समर्थन राज्य को ताकतवर बनाने के लिए करता है।

कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कहते हैं। समाजवाद से जुड़ी मार्क्स की व्याख्या को मार्क्सवाद कहा जाता है मार्क्स पूंजीवाद के विरोधी थे। उन्होने अपनी पुस्तक दास कैपिटल में पूंजी को समाज की सबसे बड़ी बुराई माना। उन्होने पूंजीवाद के खिलाफ सर्वहारा वर्ग की क्रांति एवं वर्ग संघर्ष का समर्थन किया। समाजवाद समय और स्थान के सापेक्ष रूप बदलता गया।

लेनिनवाद

रूस की क्रांति (1917) के नायक ब्लादीमीर लेनिन ने जार निकोलस द्वितीय के निरंकुश राजतंत्र के खिलाफ समाजवाद को हथियार बनाया और जनांदोलन के माध्यम से राजशाही को समाप्त करते हुए सोवियत गणराज्य की स्थापना की.

माओवाद

मार्क्सवाद का चीनी संस्करण माओत्से तुंग की देन है। आपके नेतृत्व में 1949 में चीनी क्रांति हुई और प्यूपल रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन हुआ। माओ का मानना था कि एक हिंसक क्रांति के द्वारा ही समता परक समाज की स्थापना की जा सकती है। उन्होने कहा कि सत्ता बन्दूक की नोक से निकलती है। उनका साम्यवाद कृषक वर्ग को न्याय प्रदान करने के लिए एक पीपुल्स वार का समर्थक था।

नक्सलवाद

माओवाद का भारतीय संस्करण नक्सलवाद के नाम से जाता है। इसके संस्थापक चारू मजूमदार व कान्हू सान्याल थे। 70 के दशक में आरम्भ हुआ नक्सलवाद सशस्त्र क्रांति के द्वारा सामाजिक आर्थिक असमानता लाने के लिए प्रयत्नशील है।

भारत में साम्यवाद का प्रभाव  

भारत में भी साम्यवाद का जन्म लगभग उसी समय हुआ जब सोवियत संघ में लेनिन व स्टालिन का साम्यवाद अपने चरम पर था। श्रीपद अमृत दांगे व मानवेन्द्र नाथ राय 26 दिसम्बर 1925 को भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की।

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन पर साम्यवाद का प्रभाव

भारत के क्रांतिकारी दलों जैसे युगान्तर, अनुशीलन समिति तथा हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोशिएशन पर भी साम्यवादी क्रांति का गहरा प्रभाव था। महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल ने बोल्सेविक की करतूत नामक उपन्यास में साम्यवादी क्रांति का समर्थन किया। सरदार भगत सिंह अपनी फांसी के दिन जर्मन मार्क्स वादी विचारक क्लैरा जेटकिन की पुस्तक रेमिनिसेंसेज ऑफ लेनिन (लेनिन की स्मृतियां) पढ़ रहे थें।

राम मनोहर लोहिया का नवसमाजवाद (लोहियावाद)

राम मनोहर लोहिया ने साम्यवाद और पूंजीवाद के स्थान पर नवसमाजवाद की अवधारणा दी। गांधी जी के प्रति अपार श्रद्धा का भाव रखने तथा अनेक मुद्दों पर विचारों की समानता होने के बावजूद लोहिया ने गांधी को पूर्ण नहीं माना।

गांधी और मार्क्स के प्रति अपार श्रद्धा का भाव रखने के बावजूद लोहिया गांधी और मार्क्स दोनों को पूर्ण नहीं मानते थे.

 उन्होंने यह विचार व्यक्त किया है गांधी और मार्क्स की सबसे बड़ी कमी यह है कि वे एक ही समस्या के अलग अलग पक्ष को महत्व प्रदान करते हैं। लोहिया ने मार्क्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म नामक पुस्तक में मार्क्स और गांधी दोनों के सिद्धांतों में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया।

वे साम्यवाद और पूंजीवाद के मध्य सामंजस्य स्थापित करने पर जोर देते हैं। उनका मानना था कि साम्यवाद दुनिया की आधी आबादी को भोजन देने में असमर्थ है और पूंजीवाद से एक स्वस्थ समाज की स्थापना सम्भव नहीं है।

लोहिया का मानना था कि एक स्वस्थ समाज पूंजीवाद और साम्यवाद के समन्वय से ही संभव है.

 उन्होंने ग्राम, जिला, प्रान्त एवं केन्द्र पर आधारित एक चतुस्तम्भी राजनीतिक व्यवस्था की परिकल्पना प्रस्तुत की, जो केन्द्रीकरण व विकेन्द्रीकरण के मध्य संतुलन स्थापित करता है।

नेहरु का फेबियन समाजवाद

जवाहर लाल नेहरू भी एक समाजवादी नेता थे, उनका समाजवाद फेबियन समाजवाद के नाम से जाना जाता है। फेबियन समाजवाद क्रांति की जगह लोकतांत्रिक रूपान्तरण में यकीन रखता है। उनका मानना था कि एक लोकतांत्रिक सरकार सामाजिक समता की स्थापना तथा सामाजिक न्याय का  सबसे सशक्त वाहक होती है।

उन्होने जमीनदारी उन्मूलन, कृषि योग्य भूमि के पुनर्वितरण एवं शिक्षा एवं रोजगार में समाज के कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण के लिए संविधान में अनेक संशोधन किये।

इंदिरा गांधी का समाजवाद

श्रीमति इंदिरा गांधी ने अपने पूरे शासन काल में समाजवादी विचारधारा को प्रोत्साहित करने का कार्य किया। उन्होने गरीबी हटाओ का नारा दिया। गरीबी उन्मूलन हेतू बीस सूत्री कार्यक्रम चलाया, प्रीवी पर्स की समाप्ति की, बैंकों एवं उधोगों का सार्वजनीकरण किया।

जय प्रकाश नारायण समाजवाद

जय प्रकाश नारायण ने अमेरिका में समाजशास्त्र की पढ़ाई के दौरान आप कार्ल मार्क्स से अत्यंत प्रभावित हुए। 1922 में भारत आकर वे महात्मा गांधी से जुड़ गये। वे जवाहर लाल नेहरू के अच्छे दोस्त थे। वे विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन से जुडे। वे दलविहीन (पार्टीलेस) राजनीतिक व्यवस्था के समर्थक थे। वे चाहते थे कि जनता द्वारा ग्राम स्तर पर प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाय फिर ग्राम स्तर के प्रतिनिधि राज्य स्तर के प्रतिनिधियों का चुनाव करें और राज्य स्तर के प्रतिनिधि केन्द्र स्तर पर प्रतिनिधियों का चुनाव करें। इसलिए आजादी के बाद आपने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।

जात-पात तोड़ दो, तिलक दहेज छोड़ दो, समाज के प्रवाह को मोड़ दो

लेकिन जब 1971 से पूर्ण सत्ता में आने श्रीमति इंदिरा गांधी का तानाशाही रवैया लोकतंत्र को तार तार करने लगा तो उन्होंने 5 जून 1974 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से संम्पूर्ण क्रांति का आहवान किया। उन्होने नारा दिया जात-पात तोड़ दो, तिलक दहेज छोड़ दो, समाज के प्रवाह को मोड़ दो। 

सम्पूर्ण क्रांति का नारा

इसे सम्पूर्ण क्रांति इसलिए कहा गया क्योकि, यह मात्र सत्ता परिवर्तन से सम्बन्धित क्रांति नहीं थी। सम्पूर्ण क्रांति में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्रांति सहित कुल सात क्रांतियां शामिल थी।

सम्पूर्ण क्रांति का उद्देश्य इंदिरा शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अराजकता को उखाड़ फेकना था। समकालीन राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे क्षितिज पर वर्ष 1942 दिखाई दे रहा है।

25 जून 1975 यानी इमरजेंसी से सिर्फ एक दिन पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली की जिसमें तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद करीब 7 लाख लोग इकठ्ठा हुए हर तरफ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यही कविता गूंज रही थी, कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हलांकि अगले ही दिन देश में राष्ट्रीय आपात लगा कर इस आन्दोलन को कुचल दिया गया। इमरजेंसी खत्म होने के बाद जनता पार्टी सरकार सत्ता में आयी।

                                                                                लेखक : सी एम मिश्रा