1975 का राष्ट्रीय आपात
पृष्ठभूमि
1971
में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 518 में
से 352 सीटों पर विजय प्राप्त हुई।
श्रीमती
इंदिरा गांधी की बढ़ती ताकत का फायदा इंदिरा के करीबी राजनेताओं उठाया। पूरे देश
में भ्रष्टाचार और मंहगाई अपने चरम पर पहुंच गयी।
गुजरात आन्दोलन
बढ़ती
महंगाई और भ्रष्टाचार के विरूद्ध 25 जनवरी 1974 को गुजरात में छात्रों ने
नवनिर्माण आंदोलन के नाम से प्रदर्शन आरंभ कर दिया। फलस्वरूप पूरे गुजरात में
कर्फ्यू लगा दिया गया।
गुजरात
के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को त्यागपत्र देना पड़ा। इस आंदोलन में 100
से ज्यादा लोग मौत का शिकार हुए हजारों लोग घायल हुए तथा हजारों लोगों को गिरफ्तार
किया गया।
बिहार आन्दोलन
गुजरात
का मामला अभी शांत भी नही हुआ था कि इसी तरह का एक प्रदर्शन बिहार छात्र संघर्ष
समिति के बैनर तले बिहार में आरंभ हो गया। छात्र संघर्ष समिति बिहार में अब्दुल
गफूर की सरकार को हटाने की मांग कर रही थी।
छात्रों
ने पटना विश्वविद्यालय पर कब्जा कर लिया। 18 मार्च 1974 को छात्रों और पुलिस के
बीच हिंसक झड़प हुई। इसी समय छात्रों ने जय प्रकाश नारायण से आंदोलन का नेतृत्व
करने की अपील की और जय प्रकाश नारायण इसके लिए राजी हो गये।
संपूर्ण क्रांति
5
जून 1974 को जय प्रकाश नारायण ने पटना की गांधी मैदान में ऐतिहासिक रैली को
संबोधित किया और यहीं से उन्होने इंदिरा सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा
दिया। जय प्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सबको एक जुट होने की अपील की।
उन्होने
सरकारी कर्मचारियों से भी इस आंदोलन से जुड़ने का आग्रह किया। जे पी की संपूर्ण
क्रांति ने कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन को हवा दी। धीरे-धीरे इस आंदोलन में सारे
विपक्षी दल भी जुड़ते चले गये। सिर्फ कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया ही एकमात्र ऐसी
पार्टी थी जो इस आंदोलन से नही जुडी।
इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण
1971
के आम चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली संसदीय क्षेत्र से 1 लाख से भी ज्यादा मतों
से जीती थी। इनसे हारने वाले राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा के खिलाफ
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के उल्लंघन के आरोप में मामला दर्ज कर दिया। उनके
अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गैर कानूनी साधनों का प्रयोग किया।
इस
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा की गई। उन्होने इंदिरा
गांधी को प्रधानमंत्री होते हुए भी अदालत में हाजिर होने के लिए समन जारी किया। 18
मार्च 1975 को भारतीय इतिहास में अब तक प्रथम बार किसी प्रधानमंत्री के रूप में
श्रीमती इंदिरा गांधी अदालत के कटघरे में खड़ी हुई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय
12
जून 1975 इंदिरा के लिए सबसे बुरा दिन साबित हुआ। इसी दिन इंदिरा के सहयोगी डी पी
धर का निधन हो गया। कांग्रेस गुजरात चुनाव हार गयी तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में
अपना फैसला सुनाया। इस फैसले में उच्च न्यायालय में इंदिरा गांधी को 6 वर्ष के लिए
चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दिया, साथ ही रायबरेली का चुनाव अवैध करार दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका
इलाहाबाद
कोर्ट के फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहा न्यायमूर्ति बी आर कृष्ण
अययर ने 24 जून 1975 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें उन्होने कहा कि अगली सुनवायी तक
इंदिरा गांधी को सदन में मत करने का अधिकार नही होगा तथा सांसदों को मिलने वाले
विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105) भी उनके छीन लिये जायेंगे, लेकिन वे प्रधानमंत्री
पद पर बनी रह सकती हैं।
दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली
25
जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जय प्रकाश नारायण ने एक विशाल रैली को संबोधित
करते हुए फौज और पुलिस को सरकार का साथ न देने की अपील की। शासन ने इसी अपील को
बगावत का आधार मानते हुए जय प्रकाश नारायण को गिरफ्तार करने का आदेश दिया गया।
इमरजेंसी की घोषणा
इन्ही
विषम परिस्थितियों में संजय गांधी की पहल पर व सिर्द्धाथ शंकर रे की सलाह पर 25
जून 1975 को अर्धरात्रि में भारत के राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी की
घोषणा कर दी तथा हजारों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस और मिडिया पर
प्रतिबंध लगा दिया गया।
इमरजेंसी का प्रभाव
हालांकि
इमरजेंसी के दौरान कई सुधारात्मक उपाये भी किये गये। जैसे वृक्षारोपण को बढ़ावा
दिया गया, परिवार नियोजन को अपनाने हेतु सरकारों को सख्त किया गया, रेलें अपने समय पर चलने
लगी, सरकारी
कर्मचारी समय पर ऑफिस आने लगे इत्यादि।
परिवार
नियोजन हेतु नसबन्दी कार्यक्रम चलाया गया लोगों को पकड़कर जबरदस्ती उनकी नसबन्दी की
जाने लगी। इससे सरकार के तौर तरीकों का व्यापक विरोध हुआ जो बाद में हिंसात्मक हो
गया। मुजफ्फरपुर में हुई पुलिस फायरिंग में 30 लोग मारे गये।
इसी
प्रकार दिल्ली में अतिक्रमण विरोधी मुहिम के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट पर
हजारों झुग्गी झोपड़ियों पर बुल्डोजर चलवा दिया गया। इस दौरान हुई पुलिस फायरिंग
में 150 गरीब लोग मारे गये।
इमरजेंसी
के दौरान संसद में विपक्ष के न होने का फायदा उठाकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने कई
महत्वपूर्ण संविधान संशोधन कर डाला। इससे संविधान की शक्ल ही बदल गई। ऐसे माहौल
में अचानक 18 जनवरी 1977 को श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को खत्म करने एवं आम
चुनाव करवाने की घोषणा कर दी गई। इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच हेतु
शाह आयोग की नियुक्ति की गई।
38 वां संविधान संशोधन 1975- (21 जुलाई 1975)
38
वां तथा 39 वां संशोधन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले की प्रतिक्रिया के
संदर्भ में लाया गया था जिसमें न्यायालय ने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लोकसभा में निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया
था। इंदिरा जी को डर था कि कहीं इमरजेंसी के उनके निर्णय को न्यायालय द्वारा हटा न
दिया जाय।
इसलिए
38 वे संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 352, 356 व 360 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की गयी आपात
की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया। यह भी कहा गया कि आपात की एक से
अधिक उद्घोषणायें एक साथ चल सकती हैं तथा आपात आशंका के आधार पर भी लगाया जा सकता
है।
इंदिरा
जी संसद को किनारे कर की गयी राष्ट्रपति की विधि निर्माण की शक्तियों को हथियार
बनाना चाहती थी। इसलिए इस संशोधन अधिनियम से अनुच्छेद 123 व 213 में संशोधन कर कहा
गया कि राष्ट्रपति व राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं
दी जा सकती है।
39 वां संविधान संशोधन 1975 (10 अगस्त 1975)
अब
इंदिरा जी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का डर था। पहले तो उन्होंने एक
निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में परिवर्तन
कर दिया कि चुनाव में किसी प्रतिनिधि द्वारा गलत साधन का उपयोग करने पर दोषी
व्यक्ति राष्ट्रपति के सम्मुख याचिका कर सकता है और राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम
होगा।
39
वां संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,
प्रधानमंत्री, और लोकसभा अध्यक्ष से
संबंधित विवादों को न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर किया गया। यह तय किया
गया कि इनसे संबंधित विवादों का निर्धारण संसद द्वारा सुनिश्चित किये गए प्राधिकरण
द्वारा किया जाएगा। (अनुच्छेद 329)
इस
संशोधन द्वारा निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम 1975,
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 व
मीसा को 9 वीं अनुसूची में शामिल कर दिया।
7
नवम्बर 1975 को सर्वोच्च न्यायालय में इंदिरा गाधी के चुनाव सम्बन्धी मामले की
अगली सुनवायी हुई और परिवर्तित परिस्थितियों में न्यायालय का इस मामले में सुनवाई
का अधिकार समाप्त हो गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का मामला
खारिज कर दिया। इंदिरा जी साफ साफ बच गयी।
1975 आपातकाल – TIMELINE
🔹 1971
- इंदिरा गांधी की
भारी जीत (352 सीटें)
🔹 25 जनवरी
1974
- गुजरात नवनिर्माण
आंदोलन शुरू
🔹 5 जून
1974
- Jayaprakash
Narayan → “संपूर्ण
क्रांति”
🔹 12 जून
1975
- इलाहाबाद हाईकोर्ट
→ इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द
🔹 24 जून
1975
- सुप्रीम कोर्ट → सीमित राहत
🔹 25 जून
1975 (रात)
- रामलीला मैदान
रैली
- आपातकाल घोषित
🔹 1975 (जुलाई–अगस्त)
- 38वाँ व 39वाँ संविधान संशोधन
🔹 1975–76
- प्रेस सेंसरशिप
- नसबंदी अभियान
- तुर्कमान गेट घटना
🔹 18 जनवरी
1977
- चुनाव की घोषणा
🔹 21
मार्च 1977
- आपात समाप्त


