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Sunday, March 22, 2026

1975 का राष्ट्रीय आपात

 


1975 का राष्ट्रीय आपात

पृष्ठभूमि

1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 518 में से 352 सीटों पर विजय प्राप्त हुई।

श्रीमती इंदिरा गांधी की बढ़ती ताकत का फायदा इंदिरा के करीबी राजनेताओं उठाया। पूरे देश में भ्रष्टाचार और मंहगाई अपने चरम पर पहुंच गयी।

गुजरात आन्दोलन

बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के विरूद्ध 25 जनवरी 1974 को गुजरात में छात्रों ने नवनिर्माण आंदोलन के नाम से प्रदर्शन आरंभ कर दिया। फलस्वरूप पूरे गुजरात में कर्फ्यू लगा दिया गया।

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को त्यागपत्र देना पड़ा। इस आंदोलन में 100 से ज्यादा लोग मौत का शिकार हुए हजारों लोग घायल हुए तथा हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया।

बिहार आन्दोलन

गुजरात का मामला अभी शांत भी नही हुआ था कि इसी तरह का एक प्रदर्शन बिहार छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले बिहार में आरंभ हो गया। छात्र संघर्ष समिति बिहार में अब्दुल गफूर की सरकार को हटाने की मांग कर रही थी।

छात्रों ने पटना विश्वविद्यालय पर कब्जा कर लिया। 18 मार्च 1974 को छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। इसी समय छात्रों ने जय प्रकाश नारायण से आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की और जय प्रकाश नारायण इसके लिए राजी हो गये।

संपूर्ण क्रांति

5 जून 1974 को जय प्रकाश नारायण ने पटना की गांधी मैदान में ऐतिहासिक रैली को संबोधित किया और यहीं से उन्होने इंदिरा सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। जय प्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सबको एक जुट होने की अपील की।

उन्होने सरकारी कर्मचारियों से भी इस आंदोलन से जुड़ने का आग्रह किया। जे पी की संपूर्ण क्रांति ने कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन को हवा दी। धीरे-धीरे इस आंदोलन में सारे विपक्षी दल भी जुड़ते चले गये। सिर्फ कम्यूनिष्ट पार्टी ऑफ इंडिया ही एकमात्र ऐसी पार्टी थी जो इस आंदोलन से नही जुडी।

इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण

1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली संसदीय क्षेत्र से 1 लाख से भी ज्यादा मतों से जीती थी। इनसे हारने वाले राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के उल्लंघन के आरोप में मामला दर्ज कर दिया। उनके अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गैर कानूनी साधनों का प्रयोग किया।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा की गई। उन्होने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री होते हुए भी अदालत में हाजिर होने के लिए समन जारी किया। 18 मार्च 1975 को भारतीय इतिहास में अब तक प्रथम बार किसी प्रधानमंत्री के रूप में श्रीमती इंदिरा गांधी अदालत के कटघरे में खड़ी हुई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय

12 जून 1975 इंदिरा के लिए सबसे बुरा दिन साबित हुआ। इसी दिन इंदिरा के सहयोगी डी पी धर का निधन हो गया। कांग्रेस गुजरात चुनाव हार गयी तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपना फैसला सुनाया। इस फैसले में उच्च न्यायालय में इंदिरा गांधी को 6 वर्ष के लिए चुनाव लड़ने हेतु अयोग्य करार दिया, साथ ही रायबरेली का चुनाव अवैध करार दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

इलाहाबाद कोर्ट के फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहा न्यायमूर्ति बी आर कृष्ण अययर ने 24 जून 1975 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें उन्होने कहा कि अगली सुनवायी तक इंदिरा गांधी को सदन में मत करने का अधिकार नही होगा तथा सांसदों को मिलने वाले विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105) भी उनके छीन लिये जायेंगे, लेकिन वे प्रधानमंत्री पद पर बनी रह सकती हैं। 

दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली

25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जय प्रकाश नारायण ने एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए फौज और पुलिस को सरकार का साथ न देने की अपील की। शासन ने इसी अपील को बगावत का आधार मानते हुए जय प्रकाश नारायण को गिरफ्तार करने का आदेश दिया गया।

इमरजेंसी की घोषणा

इन्ही विषम परिस्थितियों में संजय गांधी की पहल पर व सिर्द्धाथ शंकर रे की सलाह पर 25 जून 1975 को अर्धरात्रि में भारत के राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी तथा हजारों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस और मिडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इमरजेंसी का प्रभाव

हालांकि इमरजेंसी के दौरान कई सुधारात्मक उपाये भी किये गये। जैसे वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया गया, परिवार नियोजन को अपनाने हेतु सरकारों को सख्त किया गया, रेलें अपने समय पर चलने लगी, सरकारी कर्मचारी समय पर ऑफिस आने लगे इत्यादि।

परिवार नियोजन हेतु नसबन्दी कार्यक्रम चलाया गया लोगों को पकड़कर जबरदस्ती उनकी नसबन्दी की जाने लगी। इससे सरकार के तौर तरीकों का व्यापक विरोध हुआ जो बाद में हिंसात्मक हो गया। मुजफ्फरपुर में हुई पुलिस फायरिंग में 30 लोग मारे गये।

इसी प्रकार दिल्ली में अतिक्रमण विरोधी मुहिम के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट पर हजारों झुग्गी झोपड़ियों पर बुल्डोजर चलवा दिया गया। इस दौरान हुई पुलिस फायरिंग में 150 गरीब लोग मारे गये।

इमरजेंसी के दौरान संसद में विपक्ष के न होने का फायदा उठाकर श्रीमती इंदिरा गांधी ने कई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन कर डाला। इससे संविधान की शक्ल ही बदल गई। ऐसे माहौल में अचानक 18 जनवरी 1977 को श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को खत्म करने एवं आम चुनाव करवाने की घोषणा कर दी गई। इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच हेतु शाह आयोग की नियुक्ति की गई।

38 वां संविधान संशोधन 1975- (21 जुलाई 1975)

38 वां तथा 39 वां संशोधन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले की प्रतिक्रिया के संदर्भ में लाया गया था जिसमें न्यायालय ने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लोकसभा में निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया था। इंदिरा जी को डर था कि कहीं इमरजेंसी के उनके निर्णय को न्यायालय द्वारा हटा न दिया जाय।

इसलिए 38 वे संविधान संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 352, 356 व 360 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की गयी आपात की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया। यह भी कहा गया कि आपात की एक से अधिक उद्घोषणायें एक साथ चल सकती हैं तथा आपात आशंका के आधार पर भी लगाया जा सकता है।

इंदिरा जी संसद को किनारे कर की गयी राष्ट्रपति की विधि निर्माण की शक्तियों को हथियार बनाना चाहती थी। इसलिए इस संशोधन अधिनियम से अनुच्छेद 123 व 213 में संशोधन कर कहा गया कि राष्ट्रपति व राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 

39 वां संविधान संशोधन 1975 (10 अगस्त 1975)

अब इंदिरा जी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का डर था। पहले तो उन्होंने एक निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में परिवर्तन कर दिया कि चुनाव में किसी प्रतिनिधि द्वारा गलत साधन का उपयोग करने पर दोषी व्यक्ति राष्ट्रपति के सम्मुख याचिका कर सकता है और राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा।

39 वां संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और लोकसभा अध्यक्ष से संबंधित विवादों को न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर किया गया। यह तय किया गया कि इनसे संबंधित विवादों का निर्धारण संसद द्वारा सुनिश्चित किये गए प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा। (अनुच्छेद 329)

इस संशोधन द्वारा निर्वाचन कानून संशोधन अधिनियम 1975, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 व मीसा को 9 वीं अनुसूची में शामिल कर दिया।

7 नवम्बर 1975 को सर्वोच्च न्यायालय में इंदिरा गाधी के चुनाव सम्बन्धी मामले की अगली सुनवायी हुई और परिवर्तित परिस्थितियों में न्यायालय का इस मामले में सुनवाई का अधिकार समाप्त हो गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का मामला खारिज कर दिया। इंदिरा जी साफ साफ बच गयी।

 

1975 आपातकाल – TIMELINE

🔹 1971

  • इंदिरा गांधी की भारी जीत (352 सीटें)

🔹 25 जनवरी 1974

  • गुजरात नवनिर्माण आंदोलन शुरू

🔹 5 जून 1974

  • Jayaprakash Narayan संपूर्ण क्रांति”

🔹 12 जून 1975

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द

🔹 24 जून 1975

  • सुप्रीम कोर्ट सीमित राहत

🔹 25 जून 1975 (रात)

  • रामलीला मैदान रैली
  • आपातकाल घोषित

🔹 1975 (जुलाई–अगस्त)

  • 38वाँ व 39वाँ संविधान संशोधन

🔹 1975–76

  • प्रेस सेंसरशिप
  • नसबंदी अभियान
  • तुर्कमान गेट घटना

🔹 18 जनवरी 1977

  • चुनाव की घोषणा

🔹 21 मार्च 1977

  • आपात समाप्त

Sunday, November 9, 2025

सन्यासी विद्रोह (Sanyasi Rebellion) – ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रथम जन-विद्रोह

 

सन्यासी विद्रोह (Sanyasi Rebellion) – ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रथम जन-विद्रोह

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल 1857 से नहीं शुरू होता — इसकी जड़ें उससे कहीं गहरी हैं। इन्हीं आरंभिक संघर्षों में से एक था “सन्यासी विद्रोह”, जिसने अंग्रेज़ों के अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ बंगाल की भूमि पर सबसे पहले विद्रोह की चिंगारी भड़काई।


🕉️ पृष्ठभूमि

सन्यासी विद्रोह का आरंभ अठारहवीं शताब्दी में बंगाल क्षेत्र में हुआ।
1764 में बक्सर युद्ध के बाद बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को प्राप्त हो गए। इसके बाद कंपनी ने स्थानीय जनता पर कठोर कर नीति लागू कर दी।
इससे किसान, जमींदार और साधु-सन्यासी — सभी वर्गों में असंतोष फैल गया।

1770 में आई भयंकर बंगाल की अकाल (Bengal Famine) ने स्थिति को और विकट बना दिया।
अकाल के समय जब लोग भूख से मर रहे थे, तब भी अंग्रेज़ अधिकारी कर वसूलते रहे।
सन्यासियों, जो प्रायः देशभर के मंदिरों और तीर्थों से चंदा लेकर यात्रा करते थे, को भी जबरन टैक्स देना पड़ता था।
इसी अत्याचार ने इस विद्रोह को जन्म दिया।


🔥 विद्रोह की शुरुआत

इस आंदोलन का नेतृत्व धार्मिक साधुओं और संन्यासियों ने किया, जिनमें प्रमुख रूप से आनंद गिरि, भवानंद पांडे, और कई स्थानीय महंत शामिल थे।
इन सन्यासियों ने अंग्रेज़ चौकियों और राजस्व कार्यालयों पर आक्रमण किए।
उनका उद्देश्य केवल धन नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन के अन्याय का विरोध था।

सन्यासी दलों ने अंग्रेज़ी हुकूमत की कर वसूली की चौकियों को नष्ट किया और ज़ुल्म करने वाले ज़मींदारों को दंडित किया।
इसमें स्थानीय किसान और आम जनता भी उनके साथ शामिल हो गई, जिससे यह आंदोलन एक जन-विद्रोह का रूप ले लिया।


⚔️ अंग्रेज़ी दमन

ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को बड़ी गंभीरता से लिया।
जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने कठोर दमन की नीति अपनाई।
सन्यासियों को "लुटेरे" घोषित किया गया और कई को मृत्युदंड दिया गया।

लेकिन अत्याचारों के बावजूद यह विद्रोह लगभग 1763 से 1800 तक कई दशकों तक चलता रहा — जिससे यह भारत का सबसे दीर्घकालिक प्रतिरोध आंदोलन माना जाता है।


🪶 साहित्यिक छवि – ‘आनंदमठ’

इस विद्रोह की गूंज केवल इतिहास तक सीमित नहीं रही।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में इसी विद्रोह की पृष्ठभूमि को आधार बनाया।
यही वह उपन्यास था, जिसमें भारत का राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम्” पहली बार प्रस्तुत हुआ।

इस उपन्यास के माध्यम से बंकिमचंद्र ने यह दर्शाया कि कैसे धार्मिक और राष्ट्रभक्ति भावनाएँ मिलकर मातृभूमि की रक्षा का प्रतीक बनती हैं।


📜 महत्व

  • यह भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला संगठित सशस्त्र आंदोलन था।

  • इसने भविष्य में होने वाले किसान आंदोलनों और 1857 की क्रांति के लिए प्रेरणा का कार्य किया।

  • इस विद्रोह ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतवासी विदेशी शासन के अन्याय के विरुद्ध एकजुट होकर खड़े हो सकते हैं।


🇮🇳 निष्कर्ष

सन्यासी विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वह पहली लौ थी, जिसने ब्रिटिश सत्ता की नींव को हिला दिया।
यह केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का आरंभ था।
“वंदे मातरम्” की भावना इसी चेतना की परिणति थी, जो आगे चलकर पूरे राष्ट्र की प्रेरणा बन गई।


✍️ लेखक: Rudra’s IAS Team
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🌺 वंदे मातरम् : मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक 🌺

 


वंदे मातरम्” — यह मात्र एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की धड़कन है। यह वह स्वर है, जिसने आज़ादी के आंदोलन में लाखों भारतीयों के हृदय में मातृभूमि के लिए प्रेम, गर्व और बलिदान की भावना को जागृत किया। भारत का राष्ट्रीय गीत कहलाने वाला “वंदे मातरम्” हमारे राष्ट्र की अस्मिता, संस्कृति और शक्ति का अमर प्रतीक है।

✍️ रचना और प्रेरणा

इस अमर गीत की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (Bankim Chandra Chattopadhyay) ने की थी। सन् 1870 के दशक में अंग्रेज़ शासकों ने सरकारी आयोजनों में ‘God Save the Queen’ गीत गाना अनिवार्य कर दिया था।
यह आदेश भारतीयों की आत्मा को गहराई से चोट पहुँचा गया — क्योंकि इसमें राष्ट्र के गौरव का नहीं, दासता का भाव था।
बंकिमचंद्र, जो उस समय एक सरकारी अधिकारी थे, इस अन्याय से व्यथित हो उठे। उन्होंने अंग्रेज़ी प्रभुत्व के इस प्रतीक के विकल्प के रूप में एक ऐसा गीत रचा जो भारत माता के प्रति सम्मान और प्रेम से ओत-प्रोत था — और उसका नाम रखा वंदे मातरम्” अर्थात् “माता, मैं तेरा वंदन करता हूँ।”

🪶 भाषा और स्वरूप

यह गीत संस्कृत और बांग्ला — दोनों भाषाओं के मिश्रण से रचा गया था।

  • प्रथम दो पदसंस्कृत में
  • शेष पदबांग्ला भाषा में लिखे गए।

गीत में भारत माता को “सुजलाम् सुफलाम्”, “शस्य-श्यामलाम्” कहकर उनके प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्धि का वर्णन किया गया है।
राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore) ने इसे संगीतबद्ध किया और 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया।

🌏 अनुवाद और वैश्विक पहचान

वंदे मातरम् की शक्ति और सौंदर्य ने इसे सीमाओं से परे प्रसिद्धि दिलाई।

  • अरबिंदो घोष (Sri Aurobindo) ने इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया।
  • आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया।

यह गीत केवल भारतीयों के हृदय में ही नहीं, बल्कि विश्व में भी अपनी छाप छोड़ गया।
सन् 2002 में बी.बी.सी. के एक वैश्विक सर्वेक्षण में “वंदे मातरम्” को दुनिया का दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत घोषित किया गया। आयरिश समूह द वोल्फ टोन्स का गाना "ए नेशन वन्स अगेन" दुनिया का सबसे लोकप्रिय गीत है।

 🎶 गीत के पावन शब्द

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
सस्य श्यामलां मातरम्।
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम्॥

कोटि कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले,
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले।
के बोले मा तुमी अबले,
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीम् मातरम्॥

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे।
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे॥

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदल विहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी नमामि त्वाम्।
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्॥

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्॥

वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं रहा — यह क्रांतिकारियों का नारा, जनआंदोलन का प्रतीक, और स्वाभिमान की गूंज बन गया।
वंदे मातरम्” के उदघोष से भारत माता के सपूतों में बल, जोश और आत्मबल की भावना जागृत होती थी।
यह गीत आज भी हर भारतीय के लिए श्रद्धा और गर्व का प्रतीक है।

🌿 निष्कर्ष

वंदे मातरम्” भारत की संस्कृति, शक्ति, भक्ति और मातृप्रेम का सार है।
यह हमें याद दिलाता है कि भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत माता है, जो अपने संतानों की रक्षा करती है और उन्हें ज्ञान, ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करती है।
हर भारतीय के हृदय से आज भी यही स्वर गूंजता है —

💖 वंदे मातरम्! जय भारत माता! 💖

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Friday, October 17, 2025

भाग 11: अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage)

 


भाग 11: अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage)

कला/परंपरा/शिल्प

राज्य/क्षेत्र

मुख्य विशेषताएँ और विवरण

कुटियाट्टम

केरल

यह संस्कृत परंपराओं पर आधारित सबसे पुराना पारंपरिक थियेटर है।

वैदिक जप की परंपरा

भारत

यह विश्व की सबसे पुरानी जीवित सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है।

रामलीला

उत्तर भारत (अयोध्या, रामनगर, बनारस, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना, मधुबनी की सर्वाधिक प्रचलित हैं)

यह रामायण महाकाव्य का दृश्यों की एक शृंखला में प्रदर्शन है जिसमें गीत, कथन, गायन और संवाद शामिल हैं।

रम्माण

उत्तराखंड (सलूर-डुंगरा के जुड़वाँ गाँव)

यह प्रतिवर्ष अप्रैल के अंत में मनाया जाने वाला एक धार्मिक त्योहार है, जो संरक्षक देवता भूमियाल देवता के सम्मान में होता है। इसमें राम महाकाव्य और विभिन्न किंवदंतियों के एक संस्करण का पाठ, गीत और मुखौटा नृत्यों का प्रदर्शन शामिल है।

छऊ नृत्य

पूर्वी भारत (सरायकेला-झारखंड, पुरुलिया-पश्चिम बंगाल, मयूरभंज-ओडिशा)

इसमें महाभारत और रामायण सहित महाकाव्यों के प्रसंगों, स्थानीय लोककथाओं तथा अमूर्त विषयों का अभिनय किया जाता है। इसकी उत्पत्ति नृत्य और मार्शल प्रथाओं के स्वदेशी रूपों से हुई है। सरायकेला और पुरुलिया शैलियों में मुखौटे का उपयोग होता है।

कालबेलिया लोक गीत और नृत्य

राजस्थान

यह कालबेलिया समुदाय की पारंपरिक जीवन शैली की अभिव्यक्ति है, जो एक समय पेशेवर साँप संचालक थे। लहराती काली स्कर्ट में महिलाएँ नागिन की हरकतों की नकल करते हुए नृत्य करती हैं।

मुडियेट्टु

केरल

यह देवी काली और राक्षस दारिका के बीच युद्ध की पौराणिक कथा पर आधारित एक अनुष्ठानिक नृत्य नाटक है। कलाकार मंदिर के फर्श पर रंगीन पाउडर से देवी काली की एक विशाल छवि (जिसेकलाम’ कहा जाता है) बनाते हैं।

बौद्ध जप

लद्दाख

बौद्ध लामा (पुजारी) बुद्ध की भावना, दर्शन एवं शिक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले पवित्र ग्रंथों का जाप करते हैं। लद्दाख में महायान व वज्रयान प्रचलित हैं।

संकीर्तन

मणिपुर (मैदानी इलाके)

इसमें वैष्णव लोगों के धार्मिक अवसरों को चिह्नित करने के लिये अनुष्ठानिक गायन, ढोलक बजाना और नृत्य शामिल है।

पारंपरिक तौर पर पीतल और ताँबे के बर्तन बनाने का शिल्प

पंजाब (जंडियाला गुरु के ठठेरों का शिल्प)

यह ठंडी धातु की टिकिया को चपटा करके पतली प्लेट बनाने, और फिर इन प्लेटों को हथौड़े से पीटकर घुमावदार आकार देने की पारंपरिक तकनीक है।

नवरोज़

भारत (और अफगानिस्तान, ईरान, इराक, आदि में भी)

यह पारसियों (ज़ोरोएस्ट्रिनिइज़्म) और मुसलमानों (शिया व सुन्नी दोनों) के लिये नए वर्ष का जश्न है। यह प्रतिवर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है।

योग

भारत

इसमें आसन, ध्यान, नियंत्रित श्वास, शब्द जप और अन्य तकनीकों की एक शृंखला शामिल है।

कुंभ मेला

उत्तर भारत (इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में बारी-बारी से)

यह पृथ्वी पर तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण जमावड़ा है। इस दौरान यात्री पवित्र नदी में स्नान करते हैं।

दुर्गा पूजा

कोलकाता

यह हिंदू माँ देवी दुर्गा की दस दिवसीय पूजा का प्रतीक एक वार्षिक त्योहार है।

गरबा

गुजरात

यह हिंदू त्योहार नवरात्रि के अवसर पर किया जाने वाला एक अनुष्ठानिक और भक्तिपूर्ण नृत्य है, जो 'शक्ति' की पूजा के लिये समर्पित है।